हमारी मातृभाषा


यह मेरा लिखा हुआ नहीं है, ये लेख , कविता , या जो भी है, बिल्कुल सत्य है | मेरे परदादा, संस्कृत और हिंदी जानते थे। माथे पे तिलक, और सर पर पगड़ी बाँधते थे।। फिर मेरे दादा जी का, दौर आया। उन्होंने पगड़ी उतारी, पर जनेऊ बचाया।। मेरे दादा जी, अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते... Continue Reading →

समय


पांचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे. स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें । पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ।   स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में घर... Continue Reading →

वास्तविकता


पत्थर के दिल है, शीशे की जुबानें धुँए के शहर हैं,प्यार की दुकानें बोतल मे पानी,डब्बे मे हवा, झूठी मुस्काने , जीने की दवा, अकेला मुसाफिर है,रास्तो पर भीड़ सबकी अपनी दुनिया है,सबकी अपनी सीध सबके अपने मतलब,सबके जरूरी काम जब ज़रूरत पड़े,सबको सीधी राम राम सामने मेरा सबकुछ तु,तू है मेरी जान पलके झपकी... Continue Reading →

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